@ दिलीप पंड्या
चिन्तक, मनीषी, समाज-सुधारक और राष्ट्र को समर्पित संगठन @RSSorg के चौथे सरसंघचालक, परम श्रद्धेय स्व. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि! संघ परिवार के बोधि वृक्ष और निष्काम कर्मयोगी के पवित्र विचारों का प्रकाश सदैव हमारे जीवन को आलोकित करता रहेगा।– मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
एक चिन्तक ,मनीषी ,समाजसुधारक कुशलसंगठक , वैज्ञानिक ,अनासक्त कर्मयोगी ,सादगी व सेवा एवं आत्मीयता से परिपूर्ण एक आदर्श राष्ट्रवादी प्रतिमूर्ति के प्रतिबिम्ब थे —– पूर्व चतुर्थ पूज्य सरसंघचालक प्रो0 राजेन्द्र सिंह उपाख्य “रज्जू भैया ” जी
प्रो0 राजेन्द्र सिंह जी की जीवन यात्रा आम आदमी को ईमानदारी ,प्रमाणिकता,ध्येयनिष्ठा ,कर्मठता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाली है ।
रज्जू भैया का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर शहर की इन्जीनियर्स कालोनी में 29 जनवरी सन् 1922 को हुआ था।इनके पिता इं० (कुँवर) बलबीर सिंह जी एवं माता ज्वाला देवी थी। रज्जू भैय्या की प्रारंभिक पढाई बुलंदशहर, नैनीताल, उन्नाव और दिल्ली में हुई | उन्होंने बी.एस.सी. व एम.एस.सी. परीक्षा इलाहाबाद विश्व विद्यालय से 1939 -1943 में उत्तीर्ण की।विश्व विद्यालय में उनकी गिनती मेघावी छात्रों में की जाती थी ।तत्पश्चात 1943 से 1967 तक इलाहाबाद विश्व विद्यालय में भौतिकी शास्त्र विभाग में प्रवक्ता नियुक्त हुए ,फिर प्राध्यापक और अंत में विभागाध्यक्ष रहे ।महान गणतज्ञ हरीशचंद जी उनके वी0 एस 0 सी0 और एम0 एस0 सी0 के सहपाठी थे ।रज्जू भैय्या का सम्बन्ध संघ से भले ही 1942 के बाद बना, किन्तु उनका समाज कार्य के प्रति रुझान प्रारम्भ से ही था |
प्रो0 राजेन्द्र सिंह जी एम.एस.सी. में विश्वविद्यालय में द्वितीय स्थान पर रहे थे | नोबल पुरस्कार विजेता सी.वी. रामन ने उनकी प्रायोगिक परिक्षा ली और उन्हीं के रामन इफेक्ट पर रज्जू भैय्या के प्रयोग से इतने प्रभावित हुए कि 100 में से 100 अंक दे दिए और आगे शोध के लिए बंगलौर आने का निमंत्रण दे दिया | किन्तु रज्जू भैय्या को शिक्षक बनना था और अपने गुरू प्रो. कृष्णन के साथ रिसर्च करनी थी, अतः उन्होंने प्रयाग नहीं छोड़ा | कोई अन्य विद्यार्थी होता तो प्रो. रामन के प्रस्ताव को ठुकराने के बारे में सोच भी नहीं सकता था |यदि रज्जू भैया संघ के प्रचारक न निकलते तो निश्चित ही एक बहुत बड़े विख्यात वैज्ञानिक बनते | बाद में जब होमी भाभा गुरूजी से मिले तो उन्होंने कहा कि आपके कारण हमने भारत का एक श्रेष्ठ वैज्ञानिक खो दिया |
प्रयाग में उनका सम्पर्क संघ से हुआ और वे नियमित शाखा जाने लगे। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक प.पू.श्री “गुरुजी” से वे बहुत प्रभावित थे। 1943 में रज्जू भैया ने काशी से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण लिया। वहाँ श्री गुरुजी का ‘शिवाजी का पत्र,जयसिंह के नाम’ विषय पर जो बौद्धिक हुआ,उससे प्रेरित होकर उन्होंने अपना जीवन संघ कार्य हेतु समर्पित कर दिया। अब वे अध्यापन कार्य के अतिरिक्त शेष सारा समय संघ कार्य में लगाने लगे। उन्होंने घर में बता दिया कि वे विवाह के बन्धन में नहीं बधेंगे।
रज्जू भैय्या तमाम आकर्षणों को छोड़कर प्रचारक बने थे | सामान्य प्रचारकों से भिन्न वे बड़े घर के बेटे थे | हर सुख सुविधा के आदी थे | संगीत प्रेमी थे, वायलिन उनका प्रिय वाद्य था | लेकिन सब छोड़ दिया और एकनिष्ठ होकर संघ कार्य में रम गए | रज्जू भैया की संघ यात्रा असामान्य है। वे बाल्यकाल में नहीं युवावस्था में सजग व पूर्ण विकसित मेधा शक्ति लेकर प्रयाग आये। सन् 1942 में एम.एससी. प्रथम वर्ष में संघ की ओर आकर्षित हुए और केवल एक-डेढ़ वर्ष के सम्पर्क में एम.एससी. पास करते ही वे प्रयाग विश्वविद्यालय में व्याख्याता पद पाने के साथ-साथ प्रयाग के नगर कायर्वाह का दायित्व सँभालने की स्थिति में पहुँच गये। 1946 में प्रयाग विभाग के कार्यवाह, 1948 में जेल-यात्रा, 1949 में दो तीन विभागों को मिलाकर संभाग कार्यवाह, 1952 में प्रान्त कार्यवाह और 1954 में भाऊराव देवरस के प्रान्त छोड़ने के बाद उनकी जगह पूरे प्रान्त का दायित्व सँभालने लगे। 1961 में भाऊराव के वापस लौटने पर प्रान्त-प्रचारक का दायित्व उन्हें वापस देकर सह प्रान्त-प्रचारक के रूप में पुन:उनके सहयोगी बने। भाऊराव के कार्यक्षेत्र का विस्तार हुआ तो पुन: 1962 से 1965 तक उत्तर प्रदेश के प्रान्त प्रचारक, 1966 से 1974 तक सह क्षेत्र-प्रचारक व क्षेत्र-प्रचारक का दायित्व सँभाला। 1975 से 1977 तक आपातकाल में भूमिगत रहकर लोकतन्त्र की वापसी का आन्दोलन खड़ा किया। 1977 में सह-सरकार्यवाह बने तो 1978 मार्च में माधवराव मुले का सर-कार्यवाह का दायित्व भी उन्हें ही दिया गया। 1978 से 19 तक इस दायित्व का निर्वाह करके 1987 में हो० वे० शेषाद्रि को यह दायित्व देकर सह-सरकार्यवाह के रूप में उनके सहयोगी बने। 1994 में तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहब देवरस ने अपने गिरते स्वास्थ्य के कारण जब अपना उत्तराधिकारी खोजना शुरू किया तो सबकी निगाहें रज्जू भैया पर ठहर गयीं और 11 मार्च 1994 को बाला साहेब ने सरसंघचालक का शीर्षस्थ दायित्व स्वयमेव उन्हें सौंप दिया।
विश्वविद्यालय में अध्यापक रह कर भी उन्होंने अपने लिये धनार्जन नहीं किया। वे अपने वेतन की एक-एक पाई को संघ-कार्य पर व्यय कर देते थे। सम्पन्न परिवार में जन्म लेने, पब्लिक स्कूलों में शिक्षा पाने, संगीत और क्रिकेट जैसे खेलों में रुचि होने के बाद भी वे अपने ऊपर कम से कम खर्च करते थे। मितव्ययता का वे अपूर्व उदाहरण थे। वर्ष के अन्त में अपने वेतन में से जो कुछ बचता उसे गुरु-दक्षिणा के रूप में समाज को अर्पित कर देते थे। एक बार राष्ट्रधर्म प्रकाशन आर्थिक संकट में फँस गया तो उन्होंने अपने पिताजी से आग्रह करके अपने हिस्से की धनराशि देकर राष्ट्रधर्म प्रकाशन को संकट से उबारा। यह थी उनकी सर्वत्यागी संन्यस्त वृत्ति की अभिव्यक्ति!
आपातकाल के समय भूमिगत संघर्ष को चलाये रखने में रज्जू भैया की बहुत बड़ी भूमिका थी। उन्होंने प्रोफेसर गौरव कुमार के छद्म नाम से देश भर में प्रवास किया। जेल में जाकर विपक्षी नेताओं से भेंट की और उन्हें एक मंच पर आकर चुनाव लड़ने को प्रेरित किया। इसी से इन्दिरा गांधी की तानाशाही का अन्त हुआ।
रज्जू भैय्या की अविचल भारतभक्ति का प्रमाण है उनकी अंतिम इच्छा | उन्होंने कहा था कि जहां मेरा शरीर शांत हो, वहीं मेरा अंतिम संस्कार किया जाए | वह भी मातृभू भारत का ही तो हिस्सा होगा | अकारण शव इधर उधर ले जाने की आवश्यकता नहीं है | उनकी इच्छानुसार वैसा ही हुआ | उनका देहावसान 14 जुलाई 2003 को पुणे में कौशिक आश्रम में हुआ और वहीं के बैकुंठधाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया |
