विश्व की पहली संस्कृत अकादमी थी भोजशाला

विश्व की पहली संस्कृत अकादमी थी भोजशाला

राजा भोज द्वारा निर्मित भोजशाला का इतिहास…
#बसंतपंचमी #भोजशालामें_वाग्देवी
राजा भोज ने माँ सरस्वती की आराधना, हिन्दू जीवन दर्शन एवं संस्कृत के प्रसार हेतु इस्वी सन् १०३४ में माँ सरस्वती मंदिर भोजशाला का निर्माण करवाया।
माँ सरस्वती के अनन्य उपासक राजा भोज ने, जिस स्थान पर सरस्वती की साधना करके अनेकों बार दर्शन कर उनसे साक्षात्कार किया उसी स्थान पर स्वयं की कल्पना एवं वास्तु से विश्व के सर्वश्रेष्ठ सरस्वती मंदिर का निर्माण धारा नगरी में करवाया जो आज भोजशाला के नाम से विख्यात है।
(प्रबंध चिंतामणि पृष्ठ 52)

भोजशाला विशाल आवासीय विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित तत्कालीन विश्व की पहली संस्कृत अकादमी थी।
सरस्वती का यह भव्य मंदिर पूर्व की ओर मुख किये बहुमंजिला आयताकार भवन था जिसका विस्तार उत्तर में मुंज तालाब तक, पश्चिम में ज्ञानपुरा तक था जो उस समय भोजशाला के आचार्यों के रहने का स्थान था।
(समरांगण सूत्रधार, भवन निवेश पू. १६५०)
भवन का एक विशाल सभा मण्डप था जिसकी छत सैकड़ों नक्काशीदार स्तंभों पर आधारित थी तथा शिखर पर देवी-देवताओं की अनेक मूर्तियां भोजशाला की शोभा बढ़ा रही थीं। भवन में हजारों कक्ष थे। आज जो आयताकार पीठ शेष दिखाई दे रहा है यह भवन का जया का गर्भ गृह है जिसम माँ सरस्वती की प्रतिमा प्रतिष्ठित थी।

वर्तमान में इसका मात्र २०० फिट लंबा एवं ११७ फिट चौड़ा भवन शेष है जिसमे शिल्प से युक्त विशाल स्तम्भ एवं सभा मण्डप का कलात्मक सज्जावाला तत्कालीन वास्तुशिल्प का अनोखा उदाहरण है।
(भोज भारती ६८)
प्रांगण के मध्य में विशाल यज्ञकुण्ड है, जहाँ सैकड़ों वर्षों तक अविरत यज्ञ होता रहा है।

सन् १०३४ में राजा भोज की आज्ञा से विख्यात मूर्तिकार सीहर के पुत्र मनथल ने संगमरमर पत्थर पर माँ सरस्वती की सुन्दर एवं अप्रतिम प्रतिमा को गढ़ा। यह प्रतिमा मनोरम, शांत मुद्रा, मनमोहक स्वरूपा है।

सन् १०३५ में सरस्वती जन्मोत्सव बसंत पंचमी के अवसर पर ४० दिवसीय महोत्सव का आयोजन किया गया था जिसमें देश-विदेश के हजारों संतो, विद्वानों और धर्माचार्यों के सान्निध्य में माँ सरस्वती महायज्ञ के साथ वाग्देवी प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा भोजशाला में की गई।
(भोजराज पृ. ४१)
सन् १९६० में अपने देश के साहित्य के क्षेत्र में दिये जाने वाले सर्वोच प्रतिष्ठित “ज्ञानपीठ पुरस्कार’ का स्मृति चिन्ह भी भोजशाला की वागदेवी से लिया गया है।

मंदिर से लगी हुई एक कुँइया है जो अकल कुँइया के नाम से विख्यात है। इसका जल माँ सरस्वती के अभिषेक एवं विद्वानों के स्पर्श से ऐसा पावन हुआ कि जिसे पीने से बुद्धिहीन की भी बुद्धि जागृत हो जाती है। वर्तमान में यह कुँइया तथाकथित कमाल मौलाना परिसर में कैद है।

माँ सरस्वती के वरदपुत्र राजा भोज ने साहित्य, ज्योतिष, आयुर्वेद, कोष, व्याकरण, राजनीति, धर्मशास्त्र, शिल्प, दर्शन, विज्ञान, रसायन, वास्तु आदि सहित अपने युग के प्रायः सभी ज्ञात विषयों पर ८४ ग्रंथ रचे हैं।

महर्षि वाल्मिकि द्वारा रचित हिन्दुओं के महान धर्मग्रंथ रामायण के पश्चात् सर्वाधिक तथ्यपरक तथा इसके बाद में रचित समस्त रामायणों के मानक ग्रंथ चम्पू रामायण की रचना राजा भोज ने भोजशाला में की।
(परमार राजवंश का इतिहास)

महाज्ञानी राजा भोज स्वयं तो विद्वान थें ही विद्वानों के संरक्षक भी थे। उनका राजदरबार विश्व के सर्वाधिक विद्वानों से अलंकृत था।

माघ, बाणभट्ट, कालिदास, भवभूति, मानतुंग, भास्कर भट्ट, धनपाल जैसे १४०० विख्यात, प्रकाण्ड विद्वानों धर्मशास्त्रियों, कवियों की साधना स्थली के रूप में माँ सरस्वती मंदिर भोजशाला विश्वविख्यात हुई। यहाँ देश विदेश के हजारों विद्यार्थियों ने हिन्दू दर्शन एवं संस्कृत की दीक्षा प्राप्त की।
(परमार राजवंश का इतिहास)
धारा नगरी में जन्मे जैन सम्प्रदाय के महान ग्रंथकार श्री अभयदेवजी ने भोजशाला में ही अध्ययन किया। आप भोजशाला में आचार्य रहे तत्पश्चात् “सूरी’ पद प्राप्त किया।

जैन व्याकरण एवं अनेक जैन सिद्धांतों के ज्ञाता पं. धारासेन, उनके शिष्य श्री महावीर तथा विद्वान तर्कशास्त्री श्री समुद्रघोष भोजशाला में आचार्य पद पर आसीन रहे। उनके द्वारा अनेक ग्रन्थों की रचना भोजशाला में ही की गई।

वैष्णव सम्प्रदाय के अनेक धर्मग्रंथ जिसमें भगवान विष्णु के कूर्मावतार पर अवनिकूर्मशतम् के अतिरिक्त सरस्वती कण्ठाभरण, योग शास्त्र पर राजमार्तण्ड एवं अनेक विश्वविख्यात ग्रंथों की रचना भोजराज ने भोजशाला में की। काशी के महान पंडित भाव बृहस्पति ने सरस्वती साधना कर शैव सम्प्रदाय के सिद्धांतों का अध्ययन एवं प्रतिपादन किया।
(धार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर)

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